पिता की संपत्ति को लेकर परिवारों में अक्सर भ्रम और झगड़े होते हैं, क्योंकि कई लोग नियमों को ठीक से नहीं समझते। एक छोटी सी गलती, जैसे कागजात पर बिना सोचे साइन कर देना, आपकी जमीन-जायदाद पर बना हक छीन सकती है। आइए जानें कि 2026 के नियमों के तहत आपका असली अधिकार क्या है।

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संपत्ति के दो मुख्य प्रकार
सबसे पहले संपत्ति को समझें। वह दो तरह की होती है। पहली स्व-अर्जित संपत्ति, जो पिता ने अपनी कमाई से खरीदी। दूसरी पैतृक संपत्ति, जो दादा-परदादा से चली आ रही है। इनके नियम बिल्कुल अलग हैं। पैतृक वाली पर जन्म से ही सबका हक बनता है, जबकि स्व-अर्जित पर पिता की मर्जी चलती है।
स्व-अर्जित संपत्ति पर पिता का पूरा कंट्रोल
पिता ने नौकरी या व्यापार से जो मकान-जमीन कमाई, वह पूरी तरह उनकी अपनी है। वे इसे जीवित रहते बेच सकते हैं या वसीयत में किसी एक को दे सकते हैं। बेटे-बेटी का यहां कोई जन्मजात अधिकार नहीं। मृत्यु के बाद अगर वसीयत न हो, तो पत्नी, बच्चे और मां में बराबर बंटती है। लेकिन वसीयत हो तो वही अंतिम।
पैतृक संपत्ति में सबका बराबर हक
यह जमीन चार पीढ़ियों से बिना बंटे चली आ रही हो, तो पैतृक कहलाती है। बेटे-बेटी दोनों को जन्म से बराबर हिस्सा मिलता है। शादीशुदा बेटी का भी हक बना रहता है। पिता इसे अकेले किसी एक को नहीं दे सकते। बंटवारे के लिए सभी की सहमति जरूरी। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के बाद बेटियों को कॉपार्सनर का दर्जा दिया।
बेटियों के अधिकार मजबूत
अब बेटियां पैतृक संपत्ति में बेटों जितना ही हक रखती हैं। पिता के जीते जी या मरने के बाद भी दावा कर सकती हैं। शादी से अधिकार कम नहीं होता। लेकिन स्व-अर्जित पर वसीयत न हो तो ही हिस्सा मिलेगा। कई केसों में कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला दिया।
जानलेवा गलतियां जो हक छीन लें
लोग भावुक होकर गलती करते हैं। बिना पढ़े त्याग पत्र साइन कर देते हैं। सालों चुप रहने से बंटवारा मान लिया जाता है। मौखिक वादों पर भरोसा करना भारी पड़ता है। पिता ने पहले ही बेच दी तो दावा मुश्किल। समय पर कोर्ट जाएं वरना केस कमजोर।
बिना वसीयत के बंटवारा कैसे?
पिता की मृत्यु पर स्व-अर्जित संपत्ति क्लास-1 वारिसों में बंटेगी। इनमें पत्नी, बेटे-बेटियां, मां। मान लें चार वारिस हैं, तो हरेक को एक-चौथाई। वसीयत वैध हो तो वही लागू। रजिस्टर्ड वसीयत सबसे मजबूत सबूत।
हक बचाने के आसान उपाय
सबसे पहले दस्तावेज जांचें। पैतृक है या स्व-अर्जित, खसरा-खतौनी देखें। कागज साइन करने से पहले वकील दिखाएं। विवाद हो तो तुरंत राजस्व या सिविल कोर्ट जाएं। परिवार में लिखित समझौता कर लें। ये कदम उठाएं तो आपकी जायदाद सुरक्षित रहेगी।
















