
भारत की सबसे तेज रफ्तार वाली ट्रेन के नाम से मशहूर वंदे भारत एक्सप्रेस अब एक नई बहस का केंद्र बनी हुई है। बेंगलुरु से गोवा के बीच प्रस्तावित नई वंदे भारत ट्रेन 700 किलोमीटर की दूरी मात्र 30 किमी/घंटा की रफ्तार से तय करेगी, जिससे 12-13 घंटे लगेंगे। यह खबर मीडिया में वायरल हो रही है, जहां इसे ‘भारतीय रेलवे की सबसे सुस्त वंदे भारत’ कहा जा रहा है। लेकिन क्या वाकई यह ट्रेन ‘कछुए’ की चाल पर मजबूर है? आइए गहराई से समझें।
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बेंगलुरु-गोवा रूट का प्रस्ताव
दक्षिण-पश्चिम रेलवे (SWR) और कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KRCL) ने संयुक्त रूप से यह प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को भेजा है। यशवंतपुर (बेंगलुरु) से मडगांव (गोवा) तक हफ्ते में 6 दिन चलने वाली यह ट्रेन सुबह 6:05 बजे रवाना होकर शाम 7:05-7:15 बजे पहुंचेगी। स्टॉपेज होंगे हासन, सकलेशपुर, सुब्रमण्य रोड और पडिल पर। वर्तमान वास्को डा गामा-यशवंतपुर एक्सप्रेस को 13.5-15 घंटे लगते हैं, इसलिए यह ट्रेन फिर भी 2-3 घंटे की बचत करेगी। हालांकि, 160-180 kmph की क्षमता वाली वंदे भारत का औसत स्पीड 50 kmph से कम रहना सवाल खड़े कर रहा है।
वेस्टर्न घाट की चुनौतियां
रूट की मुख्य समस्या वेस्टर्न घाट का दुर्गम इलाका है। सकलेशपुर-सुब्रमण्य रोड घाट सेक्शन में तीखे मोड़, भारी ढलान, ऊंच-नीचे पहाड़ियां और भूस्खलन का खतरा है। सुरक्षा के लिए स्पीड 30-50 kmph सीमित रखनी पड़ती है। जमीन की कमी से ट्रैक अपग्रेड मुश्किल है- 60 किग्रा रेल्स, मजबूत स्लीपर या आधुनिक सिग्नलिंग नहीं। SWR ने चिक्का बाणावारा-हासन पर 110 से 130 kmph और घाट पर 30 से 40 kmph बढ़ाने का सुझाव दिया है, लेकिन अभी ट्रायल रन बाकी हैं। AEB (ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग) से लैस ट्रेनें टेस्ट होंगी।
वंदे भारत की रफ्तार का व्यापक संकट
यह समस्या बेंगलुरु-गोवा तक सीमित नहीं। पहले की चर्चा में बताया गया कि वंदे भारत की औसत स्पीड 84 kmph से गिरकर 76 kmph हो गई। ट्रैक इंफ्रास्ट्रक्चर पुराना- केवल दिल्ली-आगरा जैसे चुनिंदा रूट 160 kmph सहन कर पाते हैं। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, 2014 में 31,000 km ट्रैक 110 kmph के थे, अब 80,000 km। लेकिन पूर्ण सेमी-हाई स्पीड नेटवर्क में दशक लगेगा। कावच सिस्टम, ट्रैक डबलिंग जैसे प्रयास जारी हैं।
यात्रियों के लिए फायदे-नुकसान
फायदे साफ हैं: AC कम्फर्ट, वाई-फाई, भोजन जैसी वंदे भारत सुविधाएं गोवा जैसे टूरिस्ट रूट पर उपलब्ध होंगी। कनेक्टिविटी मजबूत होगी। लेकिन धीमी स्पीड से निराशा भी- 700 km के लिए 12 घंटे लगना हाईवे बसों से ज्यादा समय ले सकता है। रेलवे बोर्ड की मंजूरी, OHE विद्युतीकरण और ट्रायल के बाद ही लॉन्च होगा। अगर अपग्रेड होते हैं, तो समय घट सकता है।
भविष्य की उम्मीदें
यह प्रस्ताव रेलवे की चुनौतियों को उजागर करता है- हाई-स्पीड ट्रेनें लाने के बावजूद इंफ्रा बाधा। बजट 2026-27 में ट्रैक उन्नयन पर फोकस बढ़ सकता है। यात्रियों को सलाह: IRCTC ऐप पर अपडेट चेक करें। वंदे भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रतीक है, लेकिन पूर्ण क्षमता के लिए इंफ्रा क्रांति जरूरी।
















