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Property Rights: इन हालात में पिता की संपत्ति पर बेटी का दावा हो सकता है खारिज

हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005 ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर हक दिया, लेकिन स्व-अर्जित संपत्ति पर वसीयत या हक-त्याग से दावा खारिज। विनीता शर्मा फैसले ने जन्मसिद्ध अधिकार पक्का किया। 2004 से पहले बंटवारा या पिता की मृत्यु 1956 से पहले होने पर भी हक नहीं। जागरूक रहें!

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Property Rights: इन हालात में पिता की संपत्ति पर बेटी का दावा हो सकता है खारिज

भारतीय परिवारों में संपत्ति बंटवारे का विवाद सदियों पुराना है, जहां बेटियां अक्सर हाशिए पर रहीं। लेकिन 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा फैसले ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर जन्मसिद्ध हक दिया। फिर भी, कई स्थितियां ऐसी हैं जहां बेटी का दावा खारिज हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी जागरूकता ही महिलाओं को उनका हक दिला सकती है।

2005 संशोधन: मील का पत्थर

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 में 9 सितंबर 2005 से लागू संशोधन ने बेटियों को हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) में ‘हमवारिस’ (coparcener) का दर्जा दिया। पहले शादी के बाद बेटी का HUF से नाता टूट जाता था, लेकिन अब जन्म से बराबर अधिकार। यह बदलाव पैतृक संपत्ति (चार पीढ़ियों वाली) पर लागू होता है, जहां बेटी बिना बंटवारे के भी हिस्सा मांग सकती है।

विनीता शर्मा फैसला

11 अगस्त 2020 को ‘विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा’ में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने फैसला दिया: बेटी का हक जन्म से है, चाहे पिता 2005 में जीवित हों या न हों। इससे प्रकाश बनाम फुलावती (2016) जैसे पुराने फैसलों को पलटा गया। अब विवाहित-अविवाहित हर बेटी पैतृक संपत्ति की सह-मालिक।

स्व-अर्जित vs पैतृक अंतर समझें

संपत्ति दो प्रकार की होती है। स्व-अर्जित (पिता की कमाई वाली) पर उनका पूर्ण नियंत्रण वसीयत से किसी को दे सकते हैं, बेटी चुनौती न दे। पैतृक पर सभी संतानों का बराबर हक, पिता मनमाने बंटवारे या वसीयत से वंचित न करे।

प्रकारबेटी का हकअपवाद
स्व-अर्जितकोई जन्मसिद्ध नहींवसीयत मान्य
पैतृकबराबर, जन्म सेपुराना बंटवारा

दावा खारिज की 5 प्रमुख स्थितियां

कानून बेटियों के पक्ष में है, लेकिन ये हालात दावा तोड़ देते हैं:

  1. वसीयत मौजूद: स्व-अर्जित पर वैध वसीयत से बेटी बहिष्कृत।
  2. हक-त्याग पत्र: रिलीज डीड से हिस्सा छोड़ा तो पछतावा न।
  3. जीवनकाल ट्रांसफर: पिता ने बेची या रजिस्ट्री कर दी तो दावा अमान्य।
  4. 2004 से पहले बंटवारा: पैतृक का पंजीकृत विभाजन तो नया दावा नहीं।
  5. 1956 से पहले मृत्यु: मिताक्षरा कानून में केवल बेटों को हक।

हाईकोर्ट के हालिया फैसलों (2025) ने रजिस्ट्री वाले मामलों में दावे खारिज किए।

सामाजिक प्रभाव व सलाह

यह बदलाव लैंगिक समानता लाया, लेकिन ग्रामीण भारत में जागरूकता कम। वकील रामेश चंद्रा कहते हैं, “दस्तावेज जांचें, समय रहते मुकदमा दायर करें।” संपत्ति विवाद 30% परिवारिक झगड़ों का कारण। बेटियां रेवेन्यू रिकॉर्ड, वसीयत जांचें। कानूनी सहायता लें।

Author
info@gurukulbharti.in

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