आजकल लाखों लोग स्टांप ड्यूटी बचाने और टैक्स में राहत पाने के लिए पत्नी के नाम पर घर-जमीन खरीद रहे हैं। लेकिन हाईकोर्ट के ताजा फैसलों ने इस रणनीति पर पानी फेर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पति की आमदनी से ली गई संपत्ति पत्नी के नाम पर हो तो भी वह निजी मालिकाना हक नहीं बन पाती। बल्कि यह संयुक्त पारिवारिक संपत्ति का रूप ले लेती है, जिस पर बच्चे या परिवार के अन्य सदस्य भी हक जमा सकते हैं।

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कोर्ट का कड़ा रुख क्यों?
हाल के मामलों में इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 का हवाला देते हुए फैसला सुनाया। अगर पत्नी यह साबित न कर पाए कि प्रॉपर्टी उसके खुद के पैसे से खरीदी गई, तो कोर्ट इसे पति की संपत्ति मान लेगा। खासकर कैश या पति के बैंक खाते से भुगतान होने पर विवाद निपटाना मुश्किल हो जाता है। यह फैसला उन परिवारों के लिए चेतावनी है जो टैक्स चोरी के नाम पर नाम बदलकर लेन-देन करते हैं। बेनामी लेनदेन निषेध कानून के तहत ऐसी संपत्तियां जब्त भी हो सकती हैं।
टैक्स क्लबिंग, फायदे का भ्रम
कई राज्यों में महिलाओं को स्टांप ड्यूटी पर 1 से 2 प्रतिशत की छूट मिलती है। 1 करोड़ की प्रॉपर्टी पर इससे 1 से 2 लाख रुपये की बचत हो जाती है। लेकिन इनकम टैक्स कानून की धारा 64 इसे उलट देती है। पत्नी के नाम की प्रॉपर्टी से किराया, बिक्री लाभ या ब्याज पति के टैक्स स्लैब में जुड़ जाता है। नतीजा, कुल टैक्स बोझ बढ़ जाता है। 2026 के नए रजिस्ट्रेशन नियमों ने इसे और सख्त कर दिया। अब रजिस्ट्री के समय बैंक स्टेटमेंट, आय स्रोत और गिफ्ट दस्तावेज अनिवार्य हैं। बिना इनके कागजी कार्रवाई अटक सकती है।
पारिवारिक झगड़ों का खतरा
सबसे बड़ी मुसीबत पारिवारिक विवादों में है। तलाक या अनबन होने पर पत्नी संपत्ति बेच या ट्रांसफर कर सकती है। पति को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। पत्नी की असामयिक मृत्यु पर संपत्ति उसके वारिसों को चली जाती है, न कि सिर्फ पति को। विशेषज्ञ चेताते हैं कि ईएमआई पति भरे या लोन जॉइंट हो, फिर भी मालिकाना हक पर सवाल उठ सकता है। सरकारी नौकरीपेशा और छोटे व्यापारी इस जाल में सबसे ज्यादा फंस रहे हैं।
2026 के नए नियम
इस साल लागू रजिस्ट्रेशन बदलावों ने पत्नी के नाम वाली डील्स को कठघरे में ला खड़ा किया। अब महिला की वास्तविक आर्थिक क्षमता जांचनी पड़ती है। काले धन को सफेद करने वालों पर नकेल कसने का यह प्रयास है। प्रॉपर्टी बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन खरीदारों को दोहरी सावधानी बरतनी होगी।
विशेषज्ञों की सलाह
कानूनी जानकारों का मानना है कि गिफ्ट डीड या फैमिली ट्रस्ट बनाना बेहतर विकल्प है। सभी भुगतान बैंक चैनल से करें और आयकर रिटर्न में खुलासा रखें। अगर पत्नी की खुद की नौकरी या बिजनेस आय है, तो जोखिम कम रहता है। वकील अनुराग सिंह कहते हैं, छोटी बचत के चक्कर में गाढ़ी कमाई को खतरे में न डालें। प्रॉपर्टी खरीदने से पहले लीगल कंसल्टेंट से सलाह लें।
















