
देशभर में आम प्रथा है कि पति अपनी कमाई से जमीन, मकान या अन्य संपत्ति पत्नी के नाम रजिस्टर करवाते हैं। मकसद साफ – स्टांप ड्यूटी में छूट, इनकम टैक्स क्लबिंग से बचाव और आर्थिक सुरक्षा। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो इस चालाकी पर पानी फेर देगा। कोर्ट ने साफ कहा – अगर पत्नी की अपनी कमाई से संपत्ति नहीं खरीदी गई, तो वह उसकी निजी संपत्ति नहीं, बल्कि पारिवारिक संपत्ति होगी। नतीजा? पत्नी इसे अकेले न बेच सकेगी, न गिरवी रख सकेगी।
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फैसले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक पारिवारिक विवाद से जुड़ा था, जहां पत्नी ने पति की मृत्यु के बाद संपत्ति बेचने की कोशिश की। लेकिन कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत पत्नी से स्रोत स्पष्ट करने को कहा। जब वह अपनी आय (जैसे सैलरी, व्यवसाय या निवेश) से फंड साबित न कर सकी, तो संपत्ति को पति की आय से खरीदी माना गया। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि नाम से नहीं, फंड के स्रोत से मालिकाना हक तय होता है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए मिसाल बनेगा।
देश में स्टांप ड्यूटी पर महिलाओं को 1-2% की छूट कई राज्यों में मिलती है। महाराष्ट्र, दिल्ली, यूपी जैसे जगहों पर यह सुविधा आकर्षक है। लेकिन टैक्स क्लबिंग नियम (इनकम टैक्स एक्ट की धारा 64) के तहत पति-पत्नी की संयुक्त आय जोड़ी जाती है। लोग सोचते हैं कि पत्नी के नाम पर टैक्स कम हो जाएगा, लेकिन कोर्ट ने इसे बेनामी ट्रांजेक्शन (प्रॉहिबिशन एक्ट, 1988) के दायरे में डाल दिया। अगर ब्लैक मनी या अस्पष्ट स्रोत पकड़ा गया, तो संपत्ति जब्ती और जुर्माना हो सकता है।
कानूनी मालिक कौन?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के मुताबिक, पति के जीते जी पत्नी का सीधा हक नहीं। मृत्यु पर पत्नी और बच्चों को बराबर हिस्सा मिलता है, लेकिन वसीयत न होने पर परिवार के अन्य सदस्य (भाई-बहन) दावा कर सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया – पत्नी बिना सहमति के संपत्ति न तो नीलाम करेगी, न दान। तलाक केस में भी यही लागू होगा। उदाहरण के तौर पर, अगर पति ने ITR, बैंक स्टेटमेंट न दिखाए, तो पूरी प्रॉपर्टी परिवार की हो जाती है।
महिलाओं को अधिकार कब?
पत्नी को पूर्ण हक तभी मिलेगा, जब वह अपनी स्वतंत्र आय साबित करे। नौकरी, बिजनेस या गिफ्ट डीड से फंड आया हो, तो निजी संपत्ति मानी जाएगी। लेकिन ज्यादातर मामलों में महिलाएं पति पर निर्भर रहती हैं, इसलिए 90% केस पारिवारिक संपत्ति बन जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला संपत्ति विवादों को कम करेगा, लेकिन टैक्स चोरी रोकने में बड़ा हथियार बनेगा।
प्रभाव और सलाह
यह फैसला मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों में जहां प्रॉपर्टी डील आम हैं, वकीलों के पास केस बढ़ेंगे। आयकर विभाग अब स्रोत चेक करेगा। सलाह? पारदर्शी दस्तावेज रखें- बैंक ट्रांसफर, ITR कॉपी, गिफ्ट डीड। कानूनी सलाहकार से राय लें। टैक्स बचाने की बजाय संयुक्त नाम या ट्रस्ट बेहतर विकल्प। सरकार भी बेनामी संपत्ति पर नजर रखेगी।
कुल मिलाकर, हाईकोर्ट ने परंपरा को कानून के कटघरे में खड़ा कर दिया। अब नाम बदलने से संपत्ति का स्वामित्व नहीं बदलेगा। जागरूक रहें, वरना भारी पड़ सकता है!
















