वैश्विक तनाव दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहें हैं। रूस और पश्चिमी देशों के बीच जारी खींचतान, मध्य पूर्व की उथल-पुथल और एशिया में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने दुनिया को एक नए वैश्विक संघर्ष की दहलीज पर ला खड़ा किया है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि अगर तीसरा विश्व युद्ध भड़क उठे तो परमाणु हथियारों का पहला निशाना कौन से देश होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य रणनीति और भू-राजनीतिक दुश्मनी तय करेगी कि विनाश की शुरुआत कहां से होगी।

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परमाणु शस्त्रागार वाले प्रमुख राष्ट्र
दुनिया भर में कुछ चुनिंदा राष्ट्रों के पास विनाशकारी परमाणु शस्त्रागार हैं। इनमें दो महाशक्तियां सबसे आगे हैं जिनके पास हजारों हथियार मौजूद हैं। इसके बाद अन्य प्रभावशाली देश आते हैं जिनके पास सैकड़ों से लेकर कुछ दर्जन तक ऐसे हथियार हैं। ये राष्ट्र आपसी संतुलन बनाए रखने की नीति पर चलते हैं जिसे परस्पर विनाश की गारंटी कहा जाता है। इसका मतलब साफ है कि कोई भी पक्ष पहले आक्रमण की हिम्मत आसानी से नहीं जुटा पाता। लेकिन अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो पहले लक्ष्य सैन्य अड्डे, नेतृत्व केंद्र और बड़े शहरी इलाके होंगे।
यूरोप और नाटो के बीच संभावित खतरा
रूस और नाटो के बीच तनाव को देखें तो प्रमुख राजधानियां और सैन्य मुख्यालय सबसे संवेदनशील हो सकते हैं। पूर्वी यूरोप में चल रही जंग अगर फैलती है तो पश्चिमी राजधानियां खतरे के घेरे में आ सकती हैं।
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मध्य पूर्व का जटिल संकट
मध्य पूर्व में स्थिति और जटिल है। यहां एक पक्ष के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूसरे गुट का गुस्सा भरा पड़ा है। ईरान जैसे देश के प्रमुख केंद्र या इजरायल के महत्वपूर्ण ठिकाने पहले निशाने पर आ सकते हैं। अमेरिकी नेतृत्व की हालिया बयानबाजी ने इस आग में घी डालने का काम किया है।
दक्षिण और पूर्वी एशिया में जोखिम
दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों के बीच पुरानी रंजिश हमेशा जोखिम बनी रहती है। सीमा पर तनाव बढ़ने की स्थिति में दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर या पड़ोसी की राजधानी खतरे में पड़ सकती है। पूर्वी एशिया में उत्तर कोरिया की मिसाइलें दक्षिणी पड़ोसी या जापान के शहरों को निशाना बना सकती हैं। वहीं चीन का विस्तारवाद ताइवान और आसपास के क्षेत्रों को उकसा सकता है। ये सभी परिदृश्य मानवता के लिए भयावह हैं।
विनाश के वैश्विक परिणाम
एक परमाणु विस्फोट का असर सिर्फ लक्षित क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। लाखों जानें जा सकती हैं, विकिरण फैलेगा और सर्दी का लंबा दौर आ सकता है जो खाद्य संकट पैदा कर देगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। ऐसे में नेताओं को कूटनीति के रास्ते अपनाने होंगे। निरस्त्रीकरण समझौते मजबूत करने और संवाद बढ़ाने की जरूरत है। भारत जैसे जिम्मेदार राष्ट्रों को संयम बरतना होगा। क्या दुनिया इस संकट से बच पाएगी। समय ही जवाब देगा।
















