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HC Landmark Order: धर्म बदलने या शादी करने से नहीं बदलती ‘जाति’! हाई कोर्ट सुनाया फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति उसकी जन्मजात पहचान है, जिसे धर्म परिवर्तन या विवाह जैसे व्यक्तिगत निर्णयों के माध्यम से बदला नहीं जा सकता, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि एक बार जिस जाति में जन्म हो गया, वह पहचान जीवनभर अपरिवर्तनीय रहती है

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HC Landmark Order: धर्म बदलने या शादी करने से नहीं बदलती 'जाति'! हाई कोर्ट सुनाया फैसला
HC Landmark Order: धर्म बदलने या शादी करने से नहीं बदलती ‘जाति’! हाई कोर्ट सुनाया फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति उसकी जन्मजात पहचान है, जिसे धर्म परिवर्तन या विवाह जैसे व्यक्तिगत निर्णयों के माध्यम से बदला नहीं जा सकता, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि एक बार जिस जाति में जन्म हो गया, वह पहचान जीवनभर अपरिवर्तनीय रहती है।

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क्या है पूरा मामला?

यह ऐतिहासिक फैसला न्यायमूर्ति अनिल कुमार-IX की पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया, दरअसल, एक याचिका में तर्क दिया गया था कि अनुसूचित जाति (SC) की एक महिला ने जाट समुदाय (सामान्य/पिछड़ा) के व्यक्ति से शादी की है, इसलिए वह अब दलित होने का दावा नहीं कर सकती और न ही SC/ST एक्ट का लाभ ले सकती है।

कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

अदालत ने याचिकाकर्ताओं के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:

  •  कोर्ट ने कहा, “जाति एक ऐसी संस्था है जो जन्म के साथ जुड़ती है, कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना धर्म बदल सकता है या किसी अन्य जाति में विवाह कर सकता है, लेकिन इससे उसका ‘वंश’ और ‘मूल’ (Root) नहीं बदलता।”
  •  हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला SC/ST समुदाय में जन्मी है, तो विवाह के बाद भी उसे उस समुदाय को मिलने वाले कानूनी संरक्षण (जैसे SC/ST एक्ट) मिलते रहेंगे।
  •  अदालत ने पहले के निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि पिछड़ी जाति से उच्च जाति में शादी करने पर किसी व्यक्ति को उच्च जाति का दर्जा प्राप्त नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट के रुख की पुष्टि

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों के अनुरुप है, जिनमें कहा गया था कि आरक्षण और जातिगत पहचान का लाभ केवल ‘जन्म’ के आधार पर मिली ऐतिहासिक वंचनाओं को दूर करने के लिए है, न कि वैवाहिक स्थिति बदलने के लिए।

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फैसले का प्रभाव

इस फैसले से उन मामलों में स्पष्टता आएगी जहाँ जाति प्रमाण पत्र या जाति आधारित कानूनी सुरक्षा को विवाह के आधार पर चुनौती दी जाती है यह साफ हो गया है कि शादी केवल एक सामाजिक गठबंधन है, जो किसी व्यक्ति की संवैधानिक और कानूनी जातिगत पहचान को प्रभावित नहीं करता। 

HC Landmark Order
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info@gurukulbharti.in

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