
देश में अक्सर विभिन्न मांगों को लेकर राजनीतिक दलों या संगठनों द्वारा ‘भारत बंद’ का आह्वान किया जाता है, हाल ही में 12 फरवरी 2026 को भी श्रम कानूनों और व्यापार समझौतों के विरोध में ट्रेड यूनियनों द्वारा राष्ट्रव्यापी हड़ताल बुलाई गई है, ऐसे में आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी भी संगठन को देश बंद करने का कानूनी अधिकार है?
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क्या ‘भारत बंद’ वैध है?
भारतीय कानून और अदालतों के अनुसार, किसी भी संगठन या राजनीतिक दल द्वारा जबरन ‘बंद’ लागू करना पूरी तरह से असंवैधानिक और अवैध है।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: केरल उच्च न्यायालय के 1997 के फैसले को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ‘बंद’ के नाम पर किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों, जैसे आवाजाही की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता।
- हड़ताल बनाम बंद: कानून शांतिपूर्ण प्रदर्शन या स्वैच्छिक हड़ताल की अनुमति तो देता है, लेकिन जबरन चक्का जाम करना या दुकानें बंद करवाना अपराध की श्रेणी में आता है।
बंद के दौरान क्या हैं आपके अधिकार?
अदालतों द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार, बंद के दौरान निम्नलिखित व्यवस्थाएं सुनिश्चित होनी चाहिए:
- आवश्यक सेवाएं: अस्पताल, एम्बुलेंस, दवा की दुकानें, बिजली और पानी जैसी आपातकालीन सेवाएं बंद से पूरी तरह मुक्त रहती हैं।
- जबरदस्ती पर रोक: कोई भी प्रदर्शनकारी किसी नागरिक को विरोध प्रदर्शन में शामिल होने या अपनी दुकान बंद करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
- सार्वजनिक संपत्ति: यदि बंद के दौरान हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान होता है, तो इसके लिए बंद बुलाने वाले संगठन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और उनसे मुआवजे की वसूली की जा सकती है।
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पुलिस और प्रशासन की भूमिका
कानून प्रवर्तन एजेंसियां यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि बंद के दौरान जनजीवन सामान्य रहे, प्रशासन को यह अधिकार है कि वे:
- जबरन रास्ता रोकने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई करें।
- सरकारी दफ्तरों, बैंकों और परिवहन सेवाओं को सुरक्षा प्रदान करें ताकि वे सुचारू रूप से चल सकें।
12 फरवरी 2026 को होने वाले बंद के दौरान भी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अधिकांश सरकारी सेवाएं और आपातकालीन सुविधाएं सामान्य रूप से कार्य करेंगी।
















