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Micro EV Shock: क्यों फेल हो रही हैं छोटी इलेक्ट्रिक कारें? 800 अरब डॉलर के बाजार में मात्र 1.3% हिस्सेदारी की असली वजह।

भीड़भाड़ वाले शहरों के लिए माइक्रो ईवी परफेक्ट लगती हैं, फिर भी 800 अरब डॉलर के ईवी बाजार में इनका हिस्सा महज 1.37%! न स्कूटर सस्ती, न एसयूवी आरामदायक- इस बीच फंसकर फ्लॉप। चीन-भारत में SUV क्रेज हावी, कंपनियां अब टैक्सी फ्लीट पर दांव। FAME सब्सिडी से उम्मीद, लेकिन रेंज सुधार जरूरी।

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why micro electric cars are struggling to win buyers despite urban appeal

शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक जाम और पार्किंग की किल्लत के बीच कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक कारें (Micro EV) एकदम फिट बैठती नजर आती हैं। ये महज 8 फीट लंबी गाड़ियां 100 किमी/घंटा की रफ्तार तक चला सकती हैं, जो शहरी भागदौड़ के लिए परफेक्ट हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और ही बयान करते हैं। 2025 में वैश्विक इलेक्ट्रिक वाहन बाजार ने करीब 800 अरब डॉलर का कारोबार किया, मगर इन नन्ही कारों का हिस्सा महज 11 अरब डॉलर रहा- यानी कुल मार्केट में मात्र 1.37% की हिस्सेदारी। आसान शब्दों में, हर 100 रुपये के ईवी कारोबार में इनका योगदान डेढ़ रुपये से भी कम।

बाइस साल भी उम्मीदें फीकी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में भी माइक्रो ईवी की बिक्री में खास उछाल नहीं दिख रहा। 2024 में उपलब्ध 785 ईवी मॉडल्स में से सिर्फ 78 माइक्रो साइज के थे। समस्या ये है कि ये न स्कूटर की तरह सुपर-किफायती हैं, न ही बड़ी कारों जितनी आरामदायक। बजट वाले खरीदार सस्ते इलेक्ट्रिक स्कूटर चुनते हैं, जबकि मिडिल क्लास परिवार लंबी रेंज, ज्यादा स्पेस और सेफ्टी के लिए एसयूवी की ओर रुख कर रहे हैं।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि उपभोक्ता ऐसी गाड़ी चाहते हैं जो स्कूटर से सुरक्षित हो और एसयूवी से सस्ती, लेकिन माइक्रो ईवी इस ‘गोल्डन मिडिल’ में फंसकर रह गई हैं। छोटी रेंज (अक्सर 100-150 किमी), हाईवे पर कमजोर परफॉर्मेंस और क्रैश टेस्ट में कम स्कोर उनकी कमजोरी बन गई हैं।

एसयूवी का जलवा, छोटी कारें पीछे

चीन माइक्रो ईवी का हब रहा है। वहां की वुलिंग मिनी ईवी ने 2025 के अक्टूबर में टेस्ला को बिक्री में पछाड़ा भी था। लेकिन अब चीनी उपभोक्ता अमीर हो रहे हैं- उनकी पसंद बड़ी एसयूवी की ओर शिफ्ट हो गई है। भारत में भी यही ट्रेंड है। एमजी की ‘कोमेट ईवी’ (माइक्रो मॉडल) के मुकाबले उनकी ही ‘विंडसर एसयूवी’ चार गुना ज्यादा बिक रही है। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में जगह की तंगी के बावजूद लोग फीचर-पैक्ड, फैमिली-साइज गाड़ियां प्रिफर कर रहे हैं। एक सर्वे बताता है कि 70% भारतीय खरीदार अब 4-5 मीटर लंबी ईवी चुनते हैं, न कि 2.5 मीटर वाली नन्हीं।

कंपनियां हार मानने को तैयार नहीं

फिर भी, दिग्गज कदम पीछे नहीं हटा रहे। टेस्ला के एलन मस्क अपनी दो-सीट वाली ‘साइबरकैब’ को रिटेल में बेचने के बजाय रोबोटैक्सी (बिना ड्राइवर वाली किराये की टैक्सी) के रूप में उतारने की तैयारी में हैं। होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै भी नए माइक्रो मॉडल ला रहे हैं। इनके पीछे आसान वजह है- छोटी बैटरी के चलते मैन्युफैक्चरिंग सस्ती और सरकारी नियम ढीले।

लो-स्पीड व्हीकल कैटेगरी में सख्त क्रैश टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन स्टार्टअप्स की दुर्गति हो रही है। कई बंद हो चुके, बाकी फंडिंग के भूखे हैं। ऑटोमेकर्स अब फ्लीट यूज (डिलीवरी, टैक्सी) पर फोकस कर रहे हैं, जहां पर्सनल ओनरशिप की कमी फायदे में बदल सकती है।

सब्सिडी और बैटरी टेक पर निर्भर

भारत जैसे देशों में FAME जैसी स्कीम्स और लास्ट-माइल डिलीवरी की मांग माइक्रो ईवी को बूस्ट दे सकती है। लेकिन बिना इनोवेशन के—जैसे सॉलिड-स्टेट बैटरी से बेहतर रेंज- ये 2030 तक भी 5% शेयर पार नहीं कर पाएंगी। शहरीकरण बढ़ेगा, मगर उपभोक्ता की ‘बड़ा बेहतर’ सोच बदले बिना बाजार फ्लॉप बना रहेगा।

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info@gurukulbharti.in

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