
देश के रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डरों की मनमानी और खरीदारों के शोषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई फ्लैट मालिक अपना घर किराये पर चढ़ाता है, तो उसे ‘व्यावसायिक गतिविधि’ (Commercial Purpose) नहीं माना जाएगा, इस फैसले के बाद अब बिल्डर इस बहाने ग्राहकों को उपभोक्ता अदालत (Consumer Court) जाने से नहीं रोक सकेंगे।
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क्या था पूरा मामला?
यह मामला ‘विनीत बहरी बनाम एमजीएफ डेवलपर्स’ से जुड़ा है, दरअसल, कई मामलों में बिल्डर यह दलील देते थे कि चूंकि खरीदार ने फ्लैट किराये पर दिया है या वह उसमें खुद नहीं रह रहा है, इसलिए वह एक ‘इन्वेस्टर’ (निवेशक) है न कि ‘कंज्यूमर’ इस आधार पर उपभोक्ता अदालतों (NCDRC) में बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों को तकनीकी आधार पर खारिज करने की कोशिश की जा रही थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें
- जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि घर खरीदना और उसे किराये पर देना एक आम निवेश हो सकता है, लेकिन इसे ‘प्रॉफिट मेकिंग बिजनेस’ की श्रेणी में रखकर खरीदार से उसके उपभोक्ता अधिकार नहीं छीने जा सकते।
- कोर्ट ने नियम कड़ा करते हुए कहा कि यदि बिल्डर को लगता है कि खरीदार ने फ्लैट केवल मुनाफा कमाने के लिए खरीदा है, तो इसका पुख्ता सबूत बिल्डर को ही पेश करना होगा, केवल अनुमान के आधार पर केस खारिज नहीं होगा।
- इस फैसले से उन लाखों फ्लैट मालिकों को राहत मिली है जो पजेशन में देरी या खराब निर्माण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अब वे किरायेदार रखने के बावजूद कंज्यूमर कोर्ट में अपनी शिकायत जारी रख सकेंगे।
खरीदारों के लिए क्यों है यह संजीवनी?
अक्सर देखा गया है कि बिल्डर फ्लैट देने में सालों की देरी करते हैं, जब खरीदार परेशान होकर कोर्ट जाता है, तो बिल्डर वकील यह तर्क देते हैं कि “यह खरीदार तो पहले से ही कहीं और रह रहा है और इसने यह फ्लैट निवेश के लिए लिया था, इसलिए यह उपभोक्ता नहीं है।”
















