
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15(1) पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें निसंतान विधवा महिला की स्व-अर्जित संपत्ति पर मायके वालों को प्राथमिकता दी गई है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने स्पष्ट कहा कि हजारों साल पुरानी हिंदू सामाजिक संरचना को तोड़ने वाला कोई फैसला नहीं किया जाएगा। विवाह के बाद गोत्र बदलने और कन्यादान की परंपरा को मानते हुए भी, विधवा की संपत्ति ससुराल पक्ष को स्वतः नहीं मिलेगी।
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क्या है पूरा मामला?
यह फैसला केरल के एक पुराने मामले से उपजा है, जहां 1998 में एक निसंतान विधवा की मृत्यु के बाद उनकी स्व-अर्जित संपत्ति पर ससुराल वालों ने दावा किया। विधवा ससुराल में रहती थीं, लेकिन हाईकोर्ट ने मायके पक्ष के हक में फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 27 साल बाद इसे बरकरार रखा। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “कन्यादान केवल रिवाज नहीं, गोत्र दान है। विवाह के बाद महिला का गोत्र बदल जाता है, पति और ससुराल उसकी जिम्मेदारी लेते हैं। लेकिन स्व-अर्जित संपत्ति पर उनका अधिकार तभी बनता है, जब पति के वारिस जीवित हों।”
कानूनी प्रावधानों का विस्तार
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(बी) के तहत, विधवा महिला की मृत्यु पर बिना वसीयत के संपत्ति का बंटवारा तय होता है। पहली श्रेणी में संतान (पुत्र-पुत्री) को बराबर हिस्सा मिलता है। निसंतान होने पर पति के वारिसों (ससुराल पक्ष) को अधिकार। यदि पति के कोई वारिस न हों, तो संपत्ति मायके के हक में जाती है, पिता या उनके वारिसों को। कोर्ट ने जोर दिया कि ससुराल में रहना संपत्ति पर दावा साबित नहीं करता।
याचिकाकर्ताओं ने धारा को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, क्योंकि विधवा को हमेशा पति की संपत्ति पर निर्भर दिखाता है। लेकिन कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा, “कानूनी नियमों को चुनौती न दें। पारिवारिक विवाद बातचीत से सुलझाएं।” जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि विधवा अपनी संपत्ति पर वसीयत बना सकती हैं, जो कानून से ऊपर है। भले भाई से भरण-पोषण न मांगे, मायके का नैसर्गिक अधिकार बरकरार रहता है।
भविष्य की सुनवाई
एक अन्य मामले में कोरोना काल में एक युवा दंपति की बिना वसीयत मृत्यु हो गई। पति की मां और पत्नी की मां के बीच संपत्ति विवाद चल रहा है। पत्नी की मां का तर्क है कि बेटी की कमाई उन्हें मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट इसकी सुनवाई नवंबर 2025 में करेगा। यह फैसला पैतृक संपत्ति से अलग है, जहां ससुर की संपत्ति पर विधवा बहू को गुजारा भत्ता मिल सकता है।
फैसले का प्रभाव
यह निर्णय 50 साल पुराने कानून को मजबूत करता है, महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को सुरक्षित करता है। पारिवारिक विवादों में स्पष्टता आएगी, खासकर ग्रामीण भारत में जहां ससुराल वाले अक्सर दबाव बनाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विधवाओं को वसीयत बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। हिंदू विवाह अधिनियम के साथ जोड़कर देखें तो कोर्ट ने सामाजिक संरचना को संतुलित रखा।
















