हाल ही में सोशल मीडिया पर एक चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। दावा किया जा रहा है कि म्यांमार का चिन इलाका, जिसे जोलैंड कहा जा रहा है, भारत में मिल सकता है। यह खबर सुनकर उत्साह तो बढ़ता है, लेकिन गहराई से देखने पर सच्चाई कुछ और ही सामने आती है।

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दावे की शुरुआत कैसे हुई
यह बातचीत म्यांमार के चिन क्षेत्र और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के बीच पुराने सांस्कृतिक रिश्तों से जुड़ी हुई लगती है। वायरल पोस्ट्स में कहा गया कि स्थानीय लोग भारत से जुड़ना चाहते हैं। कुछ लोग 1937 से पहले के ब्रिटिश काल को आधार बनाकर तर्क देते हैं, जब बर्मा भारत का हिस्सा था। इसके अलावा म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद की अस्थिरता को भी जोड़ा जाता है। लोग वहां स्थिरता के लिए भारत की ओर रुख कर रहे हों। लेकिन इतिहास दोहराने का मतलब यह नहीं कि आज की सीमाएं बदल जाएंगी।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी से जोड़कर देखा जा रहा
कई पोस्ट्स में रणनीतिक फायदों का जिक्र है। जैसे भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से बेहतर संपर्क मिलेगा। चीन की योजनाओं पर असर पड़ेगा। म्यांमार के संसाधनों तक आसान पहुंच बनेगी। कागज पर ये तर्क मजबूत लगते हैं। लेकिन वास्तविकता में किसी देश का हिस्सा लेना इतना सरल नहीं। दोनों देशों की सहमति, स्थानीय इच्छा और वैश्विक नियमों का पालन जरूरी होता है। सिर्फ फायदे देखकर यह कदम नहीं उठाया जा सकता।
असली वजह क्या है वायरल होने की
इसकी जड़ मिजोरम के एक सांसद की चिन नेताओं से अनौपचारिक बातचीत मानी जाती है। वहां भावुक बयानबाजी हुई, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। लेकिन सांसद का निजी विचार सरकार की नीति नहीं होता। विदेश मंत्रालय या गृह मंत्रालय से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। संसद में भी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। यानी यह व्यक्तिगत टिप्पणी मात्र है।
जमीन पर स्थिति बिल्कुल उलट
भारत सरकार सीमा सुरक्षा पर जोर दे रही है। म्यांमार सीमा पर फ्री मूवमेंट को खत्म किया जा रहा। मणिपुर में 398 किलोमीटर बाड़बंदी तेज हो गई। नशीले पदार्थों और हथियार तस्करी रोकने का फोकस है। अगर विलय की योजना होती, तो सीमा खोलने की बात आती। यह सब उलट दिशा दिखाता है।
कानूनी और वैश्विक बाधाएं
म्यांमार संप्रभु देश है। उसके हिस्से को लेना संयुक्त राष्ट्र नियमों का उल्लंघन होगा। चीन का वहां भारी निवेश है, जो तनाव बढ़ा सकता। भारत की नीति पड़ोसियों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की है। पूर्वोत्तर में शांति स्थापित हो रही, नया संघर्ष जोखिम भरा होगा।
















